नारद-भक्ति-सूत्र संस्कृत-हिन्दी
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः ॥१॥
१. अब हम भक्तिकी व्याख्या करेंगे।
सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा ॥२॥
२. वह (भक्ति) ईश्वरके प्रति परम प्रेमरूपा है।
अमृतस्वरूपा च ॥३॥
३. और अमृतस्वरूपा (भी) है।
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति ॥४॥
४. जिसको (परम प्रेमरूपा और अमृतस्वरूपा भक्तिको) पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है (और) तृप्त हो जाता है।
यत्प्राप्य न किंचिद्वाञ्छति न शोचति न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति ॥५॥
५. जिसके (प्रेमस्वरूपा भक्तिके) प्राप्त होनेपर मनुष्य न किसी भी वस्तुकी इच्छा करता है, न शोक करता है, न द्वेष करता है, न किसी वस्तुमें आसक्त होता है और न उसे (विषयभोगोंकी प्राप्तिमें) उत्साह होता है।
यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति ॥६॥
६. जिसको (परम प्रेमरूपा भक्तिको) जान (प्राप्त) कर मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध (शान्त) हो जाता है, (और) आत्माराम बन जाता है।
सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात् ॥७॥
७. वह (प्रेमा भक्ति) कामनायुक्त नहीं है; क्योंकि वह निरोधस्वरूपा है।
निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः ॥८॥
८. लौकिक और वैदिक (समस्त) कर्मोंके त्यागको निरोध कहते हैं।
तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता च ॥९॥
९. उस प्रियतम भगवानमें अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषयमें उदासीनताको भी निरोध कहते हैं।
अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता ॥१०॥
१०. (अपने प्रियतम भगवानको छोड़कर) दूसरे आश्रयोंके त्यागका नाम अनन्यता है।
लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता ॥११॥
११. लौकिक और वैदिक कर्मोमें भगवानके अनुकूल कर्म करना ही उसके प्रतिकूल विषयोंमें उदासीनता है।
भवतु निश्चयदादयदूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम् ॥१२॥
१२. (विधिनिषेधसे अतीत अलौकिक प्रेमप्राप्ति करनेका मनमें) दृढ़ निश्चय हो जानेके बाद भी शास्त्रकी रक्षा करनी चाहिये। अर्थात् भगवदनुकूल शास्त्रोक्त कर्म करने चाहिये।
अन्यथा पातित्याशंकया ॥१३॥
१३. नहीं तो गिर जानेकी सम्भावना है।
लोकोऽपि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीरधारणावधि ॥१४॥
१४. लौकिक कर्मोंको भी तबतक (बाह्यज्ञान रहनेतक विधिपूर्वक करना चाहिये) पर भोजनादि कार्य जबतक शरीर रहेगा तबतक होते रहेंगे।
तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतभेदात् ॥१५॥
१५. अब नाना मतोंके अनुसार उस भक्तिके लक्षण कहते हैं।
पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्य: ॥१६॥
१६. पराशरनन्दन श्रीव्यासजीके मतानुसार भगवानकी पूजा आदिमें अनुराग होना भक्ति है।
कथादिष्विति गर्ग: ॥१७॥
१७. श्रीगर्गाचार्यके मतसे भगवानको कथा आदिमें अनुराग होना ही भक्ति है।
आत्मरत्यविरोधेनेति शाण्डिल्यः ॥१८॥
१८. शाण्डिल्य ऋषिके मत में आत्मरति के अविरोधी विषयमें अनुराग होना ही भक्ति है।
नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता परमव्याकुलतेति ॥१९॥
१९. परन्तु देवर्षि नारद के मत से अपने सब कर्मों को भगवान् के अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा भी विस्मरण होने में परम व्याकुल होना ही भक्ति है।
अस्त्येवमेवम् ॥२०॥
२०. ठीक ऐसा ही है।
यथा व्रजगोपिकानाम् ॥२१॥
२१. जैसे व्रजगोपियोंकी (भक्ति)।
तत्रापि न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः ॥२२॥
२२. इस अवस्थामें भी (गोपियोंमें) माहात्म्यज्ञानकी विस्मृतिका अपवाद नहीं।
तद्विहीनं जाराणामिव ॥२३॥
२३. उसके बिना (भगवानको भगवान जाने बिना किया जानेवाला ऐसा प्रेम) जारोंके (प्रेमके) समान है।
नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम् ॥२४॥
२४. उसमें (जारके प्रेममें) प्रियतमके सुखसे सुखी होना नहीं है।
सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा ॥२५॥
२५. वह (प्रेमरूपा भक्ति) तो कर्म, ज्ञान और योगसे भी श्रेष्ठतर है।
फलरूपत्वात् ॥२६॥
२६. क्योंकि (वह भक्ति) फलरूपा है।
ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च ॥२७॥
२७. ईश्वरका भी अभिमानसे द्वेषभाव है और दैन्यसे प्रियभाव है।
तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके ॥२८॥
२८. उसका (भक्तिका) साधन ज्ञान ही है, किन्हीं (आचार्यों) का यह मत है।
अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये ॥२९॥
२९. दूसरे (आचार्यों) का मत है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर एक-दूसरे के आश्रित हैं।
स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः ॥३०॥ (पाठभेद ब्रह्ककुमार:)
३०. ब्रह्मकुमारोंके (सनत्कुमारादि और नारदके) मतसे भक्ति स्वयं फलरूपा है।
राजगृहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात् ॥३१॥
३१. राजगृह और भोजनादिमें ऐसा ही देखा जाता है।
न तेन राजपरितोषः क्षुधाशान्तिर्वा ॥३२॥
३२. न उससे (जान लेनेमात्रसे) राजाकी प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।
तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः ॥३३॥
३३. अतएव (संसारके बन्धनसे) मुक्त होनेकी इच्छा रखनेवालोंको भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिये।
तस्या: साधनानि गायन्त्याचार्या: ॥३४॥
३४. आचार्यगण उस भक्तिके साधन बतलाते हैं।
तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागाच्च ॥३५॥
३५-वह (भक्ति. साधन) विषयत्याग और संगत्यागसे सम्पन्न होता है।
अव्यावृतभजनात् ॥३६॥
३६. अखण्ड भजनसे (भक्तिका साधन) सम्पन्न होता है।
लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्त्तनात् ॥३७॥
३७. लोकसमाजमें भी भगवद्-गुण-श्रवण और कीर्तनसे (भक्ति-साधन) सम्पन्न होता है।
मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा ॥३८॥
३८. परन्तु (प्रेमभक्तिकी प्राप्तिका साधन) मुख्यतया (प्रेमी) महापुरुषोंकी कृपासे अथवा भगवत्कृपाके लेशमात्रसे होता है।
महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च ॥३९॥
३९. परन्तु महापुरुषोंका संग दुर्लभ, अगम्य और अमोघ है।
लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव ॥४०॥
४०. उस (भगवान) की कृपासे ही (महापुरुषोंका) संग भी मिलता है।
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ॥४१॥
४१. क्योंकि भगवानमें और उनके भक्तमें भेदका अभाव है।
तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम् ॥४२॥
४२. (अतएव) उस (महत्संग) की ही साधना करो, उसीकी साधना करो।
दुःसंगः सर्वथैव त्याज्यः ॥४३॥
४३. दुःसंगका सर्वथा ही त्याग करना चाहिये।
कामक्रोधमोह स्मृतिभ्रंशबुद्धिनाश सर्वनाश कारणत्वात् ॥४४॥
४४. क्योंकि वह (दुःसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश एवं सर्वनाशका कारण है।
तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति ॥४५॥
४५. ये (काम-क्रोधादि) पहले तरंगकी तरह (क्षुद्र आकारमें) आकर भी (दुःसंगसे विशाल) समुद्रका आकार धारण कर लेते हैं।
कस्तरति कस्तरति मायाम्, यः संगांस्त्यजति यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति ॥४६॥
४६. (प्रश्न) कौन तरता है? (दुस्तर) मायासे कौन तरता है? (उत्तर) जो सब संगोंका परित्याग करता है, जो महानुभावोंकी सेवा करता है और जो ममतारहित होता है।
यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्धमुन्मूलयति, निस्त्रैगुण्यो भवति, योगक्षेमं त्यजति ॥४७॥
४७. जो निर्जन स्थानमें निवास करता है, जो लौकिक बन्धनोंको तोड़ डालता है, जो तीनों गुणोंसे परे हो जाता है और जो योग तथा क्षेमका परित्याग कर देता है।
यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति ततो निर्द्वन्द्वो भवति ॥४८॥
४८. जो कर्मफलका त्याग करता है, कर्मोंका भी त्याग करता है और तब सब कुछ त्यागकर जो निर्द्वन्द्व हो जाता है।
वेदानपि संन्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते ॥४९॥
४९. जो वेदोंका भी भलीभाँति परित्याग कर देता है और जो अखण्ड असीम भगवत्प्रेम प्राप्त कर लेता है।
स तरति स तरति स लोकांस्तारयति ॥५०॥
५०. वह तरता है, वह तरता है, वह लोकोंको तार देता है।
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम् ॥५१॥
५१. प्रेमका स्वरूप अनिर्वचनीय है।
मूकास्वादनवत् ॥५२॥
५२. गूँगेके स्वादकी तरह।
प्रकाशते क्वापि पात्रे ॥५३॥ (पाठभेद प्रकाश्यते)
५३. किसी बिरले योग्य पात्रमें (प्रेमी भक्तमें) ऐसा प्रेम प्रकट भी होता है।
गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम् ॥५४॥
५४. यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्म भी सूक्ष्मतर है और अनुभवरूप है।
तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति (तदेव भाषयति) तदेव चिन्तयति ॥५५॥
५५. इस प्रेमको पाकर प्रेमी इस प्रेमको ही देखता है, प्रेमको ही सुनता है, प्रेमका ही वर्णन करता है और प्रेमका ही चिन्तन करता है।
गौणी त्रिधा गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा ॥५६॥
५६. गौणी भक्ति गुणभेदसे अथवा आर्तादि-भेदसे तीन प्रकारकी होती है।
उत्तरस्मादुत्तरस्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति ॥५७॥
५७. (उनमें) उत्तर-उत्तर क्रमसे पूर्व-पूर्व क्रमकी भक्ति कल्याणकारिणी होती है।
अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ ॥५८॥
५८. अन्य सबकी अपेक्षा भक्ति सुलभ है।
प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात् ॥५९॥
५९. क्योंकि भक्ति स्वयं प्रमाणरूप है, इसके लिये अन्य प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है।
शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च ॥६०॥
६०. भक्ति शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है।
लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात् ॥६१॥ (लोकवेद्शीलत्वात्)
६१. लोकहानिकी चिन्ता (भक्तको) नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह (भक्त) अपने-आपको और लौकिक, वैदिक (सब प्रकारके) कर्मोंको भगवानके अर्पण कर चुका है।
न तदसिद्धौ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत् साधनं च कार्यमेव ॥६२॥ (तत्सिद्धौ)
६२. (परन्तु) जबतक भक्तिमें सिद्धि न मिले तबतक लोकव्यवहारका त्याग नहीं करना चाहिये, किन्तु फल त्यागकर (निष्कामभावसे) उस भक्तिका साधन करना चाहिये।
स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं न श्रवणीयम् ॥६३॥
६३. स्त्री, धन, नास्तिक और वैरीका चरित्र नहीं सुनना चाहिये।
अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम् ॥६४॥
६४. अभिमान, दम्भ आदिका त्याग करना चाहिये ।
तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम् ॥६५॥
६५. सब आचार भगवानके अर्पण कर चुकनेपर यदि काम, क्रोध, अभिमानादि हों तो उन्हें भी उस (भगवान्) के प्रति ही करना चाहिये।
त्रिरूपभंगपूर्वकं नित्यदासनित्यकान्ताभजनात्मकं वा प्रेमैव कार्यम्, प्रेमैव कार्यम् ॥६६॥
६६. तीन (स्वामी, सेवक और सेवा) रूपोंको भंगकर नित्य दासभक्तिसे या नित्य कान्ताभक्तिसे प्रेम ही करना चाहिये, प्रेम ही करना चाहिये।
भक्ता एकान्तिनो मुख्याः ॥६७॥
६७. एकान्त (अनन्य) भक्त ही श्रेष्ठ हैं।
कण्ठावरोधरोमांचाश्रुभिः परस्परं लपमानाः पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च ॥६८॥
६८. ऐसे अनन्य भक्त कण्ठावरोध, रोमांच और अश्रुयुक्त नेत्रवाले होकर परस्पर सम्भाषण करते हुए अपने कुलोंको और पृथ्वीको पवित्र करते हैं।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि ॥६९॥
६९. ऐसे भक्त तीर्थोंको सुतीर्थ, कर्मोंको सुकर्म और शास्त्रोंको सत् - शास्त्र कर देते हैं।
तन्मया: ॥७०॥
७०. (क्योंकि) वे तन्मय हैं।
मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवताः सनाथा चेयं भूर्भवति ॥७१॥
७१. (ऐसे भक्तोंका आविर्भाव देखकर ) पितरगण प्रमुदित होते हैं, देवता नाचने लगते हैं और यह पृथ्वी सनाथा हो जाती है।
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः ॥७२॥
७२. उनमें (भक्तोंमें) जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और क्रियादिका भेद नहीं है।
यतस्तदीया: ॥७३॥
७३. क्योंकि (भक्त सब) उनके (भगवानके) ही हैं।
वादो नावलम्ब्य: ॥७४॥
७४. (भक्तको) वाद-विवाद नहीं करना चाहिये।
बाहुल्यावकाशादनियतत्वाच्च ॥७५॥
७५. क्योंकि (वाद-विवादमें) बाहुल्यका अवकाश है और वह अनियत है।
भक्तिशास्त्राणि मननीयानि तदुद्बोधककर्माण्यपि करणीयानि ॥७६॥
७६. (उस प्रेमाभक्तिकी प्राप्तिके लिये) भक्तिशास्त्रका मनन करते रहना चाहिये और ऐसे कर्म भी करने चाहिये जिनसे भक्तिकी वृद्धि हो ।
सुखदुःखेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाणे क्षणार्द्धमपि व्यर्थं न नेयम् ॥७७॥
७७. सुख, दुःख, इच्छा, लाभ आदिका (पूर्ण) त्याग हो जाय ऐसे कालकी बाट देखते हुए आधा क्षण भी (भजन बिना) व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये ।
अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारित्र्याणि परिपालनीयानि ॥७८॥
७८. (प्रेमा भक्तिके साधकको) अहिंसा, सत्य, शौच, दया, आस्तिकता आदि आचरणीय सदाचारोंका भली भाँति पालन करना चाहिये।
सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तितैर्भगवानेव भजनीयः ॥७९॥
७९. सब समय सर्वभावसे निश्चिन्त होकर (केवल) भगवानका ही भजन करना चाहिये ।
स कीर्त्यमानः शीघ्रमेवाविर्भवति अनुभावयति च भक्तान् ॥८०॥
८०. वे भगवान् (प्रेमपूर्वक) कीर्तित होनेपर शीघ्र ही प्रकट होते हैं और भक्तोंको अपना अनुभव करा देते हैं।
त्रिसत्यस्य भक्तिरेव गरीयसी, भक्तिरेव गरीयसी ॥८१॥
८१. तीनों (कायिक, वाचिक, मानसिक) सत्योंमें (अथवा तीनों कालोंमें सत्य भगवानकी) भक्ति ही श्रेष्ठ है, भक्ति ही श्रेष्ठ है।
गुणमाहात्म्यासक्ति रूपासक्ति पूजासक्ति स्मरणासक्ति दास्यासक्ति सख्यासक्ति वात्सल्यसक्ति कान्तासक्ति आत्मनिवेदनासक्ति तन्मयतासक्ति परमविरहासक्ति रूपाएकधा अपि एकादशधा भवति ॥८२॥
८२. यह प्रेमरूपा भक्ति एक होकर भी १) गुणमाहात्म्यासक्ति, २) रूपासक्ति, ३) पूजासक्ति, ४) स्मरणासक्ति, ५) दास्यासक्ति, ६) सख्यासक्ति, ७) कान्तासक्ति, ८) वात्सल्यासक्ति, विरहासक्ति ९) आत्मनिवेदनासक्ति, १०) तन्मयतासक्ति और ११) परम विरहासक्ति - इस प्रकारसे ग्यारह प्रकारकी होती है।
इत्येवं वदन्ति जनजल्पनिर्भयाः एकमताः कुमार व्यास शुक शाण्डिल्य गर्ग विष्णु कौण्डिण्य शेषोद्धवारुणि बलि हनुमद् विभीषणादयो भक्त्याचार्याः ॥८३॥
८३. कुमार (सनत्कुमारादि), वेदव्यास, शुकदेव, शाण्डिल्य, गर्ग, विष्णु, कौण्डिन्य, शेष, उद्भव, आरुणि, बलि, हनूमान्, विभीषण आदि भक्तितत्त्वके आचार्यगण लोगोंकी निन्दा स्तुतिका कुछ भी भय न कर (सब) एकमतसे ऐसा ही कहते हैं (कि भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है)।
य इदं नारदप्रोक्तं शिवानुशासनं विश्वसिति श्रद्धत्ते स प्रेष्ठं लभते स प्रेष्ठं लभत इति ॥८४॥
८४. जो इस नारदोक्त शिवानुशासनमें विश्वास और श्रद्धा करते हैं वे प्रियतमको पाते हैं, वे प्रियतमको पाते हैं।
पाठभेद - ब्रह्ककुमार: ३०, प्रकाश्यते ५३, लोकवेद्शीलत्वात् ६१, तत्सिद्धौ ६२
गीता प्रेस संस्करण से रूपांतरित